Jhunjhunu Update
झुंझुनूं का नं. 1 न्यूज़ नेटवर्क

जानलेवा हमले के मामले में दो आरोपियों को 10-10 साल की सजा, 50 हजार जुर्माना भी लगाया

एडीजे संख्या दो आशीष कुमावत ने फैसले में लिखा, न्यायाधीश को भूसे में से गेंहू चुनने की भांति झूठ में से सच को अलग करने का प्रयास करना चाहिए

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झुंझुनूं । एडीजे संख्या दो आशीष कुमावत ने फैसले में लिखा, न्यायाधीश को भूसे में से गेंहू चुनने की भांति झूठ में से सच को अलग करने का प्रयास करना चाहिएकरीब साढ़े तीन साल पुराने एक जानलेवा हमले के मामले में झुंझुनूं के एडीजे कोर्ट संख्या दो ने फैसला सुनाते हुए दो आरोपियों को 10—10 साल के कारावास की सजा सुनाई है।

एपीपी प्रदीप शर्मा ने बताया कि 18 सितंबर 2020 को बास नानग निवासी मक्खनलाल स्वामी ने सदर थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई थी कि 14 सितंबर 2020 को उसके बेटे हेमंत और पवन स्कूटी से खेत जा रहे थे। रास्ते में बास नानग निवासी कमल कुमार स्वामी तथा श्रीगंगानगर के लालगढ़ जाटान निवासी मोहित व अन्य ने उन्हें रास्ते में रोककर कसिया और लाठियों से मारपीट कर जानलेवा हमला किया। जिसके बाद मोहित की हालत गंभीर होने पर उसका चार-पांच दिनों तक जयपुर में ईलाज चला।

पुलिस ने यह मामला दर्ज कर जांच शुरू की और भारतीय दंड संहिता की धारा 323, 341, 325, 307 में चार्जशीट पेश की। कोर्ट में चले ट्रायल के दौरान नौ गवाहों और 22 दस्तावेज प्रस्तुत किए गए। दोनों पक्षों की बहस के बाद न्यायाधीश आशीष कुमावत ने दोनों आरोपियों को 10—10 साल की सजा और 50—50 हजार रूपए के अर्थदंड से दंडित किया।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का भी फैसले में जिक्र किया
इस फैसले में खास बात यह रही कि न्यायाधीश आशीष कुमावत ने स्टेट आफ यूपी बनाम अनिल सिंह के एक मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का हवाला दिया है। जिसमें उन्होंने कहा है कि न्यायाधीश को आसान तरीका अपनाकर यह निर्धारित नहीं कर देना चाहिए कि साक्ष्य प्रतिकूल है। इसलिए समस्त मामला झूठा है। बल्कि भूसे में से गेंहू के दाने चुनने की भांति झूठ में से सच को अलग करने का प्रयास करना चाहिए।

इसके अलावा न्यायाधीश आशीष कुमावत ने दयाल सिंह व अन्य बनाम उतराचंल राज्य में माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणी को भी अपने इस फैसले में उल्लेखित किया है। जिसमें माननीय सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि किसी आपराधिक विचारण के दौरान न्यायाधीश केवल इसलिए नहीं बैठता कि कोई भी निर्दोष व्यक्ति दंडित न हो जावे। बल्कि वह इसलिए भी बैठता है कि कोई भी दोषी व्यक्ति बचने नहीं पाये और दोनों ही बातें उतनी ही महत्वपूर्ण है और दोनों ही बातें न्यायाधीश के लोक कर्तव्य का हिस्सा है।